मुंबई, 16 अक्टूबर। भारत अब वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में लगभग 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है और चीन+1 रणनीति के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण से लाभ उठाने की स्थिति में है। यह जानकारी कामायक्या वेल्थ मैनेजमेंट (KamayaKya Wealth Management) की सह-संस्थापक और स्मॉलकेस मैनेजर नित्या शाह द्वारा जारी रिपोर्ट “द फ्यूचर ऑफ मैन्युफैक्चरिंग: इंडिया’स चाइना+1 अपॉर्च्युनिटी” में दी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोप की औद्योगिक चुनौतियां और भारत की बढ़ती विनिर्माण क्षमताएं आने वाले दशक में भारतीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर सकती हैं।
यूरोप ने 2022 से 2025 के बीच 37 मिलियन टन केमिकल क्षमता बंद करने की घोषणा की है, जबकि जर्मनी में 2025 में 24,064 कॉरपोरेट दिवालिया मामले दर्ज हुए, जो 11 वर्षों में सबसे अधिक हैं। इसके विपरीत, भारत के आईफोन निर्यात 2025-26 में लगभग ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गए और सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 17 प्रतिशत बढ़कर US$94.5 अरब हो गया, जिससे विनिर्माण क्षेत्र में तेजी का संकेत मिलता है।
चीन+1 रणनीति से नए अवसर
चीन+1 रणनीति के तहत वैश्विक कंपनियां चीन के अलावा अन्य विनिर्माण ठिकाने तलाश रही हैं, जिससे यह बदलाव आ रहा है। चीन की वैश्विक विनिर्माण में हिस्सेदारी लगभग 29 प्रतिशत है, जबकि भारत की 3 प्रतिशत। ऐसे में भारत की हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि भी उल्लेखनीय विकास ला सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रसायन, फार्मास्युटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे क्षेत्र प्रमुख लाभार्थी होंगे।
“चीन+1 अवसर का मतलब चीन को रातोंरात बदलना नहीं है, बल्कि लचीली और विविध आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाना है। भारत के पास घरेलू बाजार, इंजीनियरिंग क्षमताएं और विनिर्माण आधार है जिससे वह वैश्विक उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है,” नित्या शाह, स्मॉलकेस मैनेजर और सह-संस्थापक, कामायक्या वेल्थ मैनेजमेंट ने कहा।
यूरोप की औद्योगिक मंदी और भारत की मजबूती
यूरोप का विनिर्माण क्षेत्र उच्च ऊर्जा और श्रम लागत के दबाव में है, जिसमें केमिकल उद्योग सबसे अधिक प्रभावित है—2022 से 2025 के बीच क्षमता बंदी क्षेत्र की कुल क्षमता का लगभग 9 प्रतिशत है। रिपोर्ट का कहना है कि ये आपूर्ति अंतर भारतीय निर्माताओं के लिए लाभकारी हो सकते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां वे पहले से स्थापित हैं और वैश्विक ग्राहकों के साथ संबंध रखते हैं।
भारत की मजबूती केवल लागत प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पास बड़ा घरेलू बाजार, इंजीनियरिंग और केमिस्ट्री में कुशल प्रतिभा, और फार्मास्युटिकल्स, केमिकल्स, फोर्जिंग्स, कास्टिंग्स और ऑटो कंपोनेंट्स में मजबूत औद्योगिक आधार है।
विनिर्माण वृद्धि और सरकारी प्रोत्साहन
फिलहाल विनिर्माण भारत के जीडीपी का लगभग 13 प्रतिशत है, जबकि नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन का लक्ष्य 2035 तक इसे 25 प्रतिशत तक पहुंचाना है। 2025-26 में भारत ने US$441.8 अरब का माल निर्यात दर्ज किया, जिसमें US$122.4 अरब इंजीनियरिंग वस्तुएं और US$48 अरब इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। सकल एफडीआई US$94.5 अरब रहा, जो सालाना 17 प्रतिशत की वृद्धि है।
प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं से दिसंबर 2025 तक 14 क्षेत्रों में ₹2.16 लाख करोड़ का निवेश आया, जिससे कुल उत्पादन और बिक्री ₹20.41 लाख करोड़, निर्यात ₹8.3 लाख करोड़ और 14.4 लाख प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए। हालांकि, कुल ₹1.91 लाख करोड़ के बजट में से केवल ₹28,748 करोड़ प्रोत्साहन के रूप में वितरित हुए हैं, जिससे बेहतर क्रियान्वयन की आवश्यकता उजागर होती है।
इन पांच क्षेत्रों को मिलेगा लाभ
रिपोर्ट के अनुसार, पांच विनिर्माण क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां अच्छी स्थिति में हैं:
ऑटो कंपोनेंट्स और प्रिसिजन इंजीनियरिंग: इस उद्योग ने 2025-26 में ₹7.6 लाख करोड़ का टर्नओवर और US$24 अरब का निर्यात दर्ज किया, जिसमें यूरोप सबसे तेजी से बढ़ता निर्यात गंतव्य रहा। जर्मन सप्लायर ZF ने 2030 तक भारत से सोर्सिंग को €2 अरब तक चौगुना करने का लक्ष्य रखा है।
फार्मास्युटिकल्स और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग: भारत का कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग बाजार 2022-23 के US$7.3 अरब से बढ़कर 2027-28 तक US$14.1 अरब होने का अनुमान है।
स्पेशलिटी केमिकल्स: भारतीय कंपनियां दीर्घकालिक अनुबंधों के लिए क्षमता बढ़ा रही हैं, हालांकि चीन में अधिक उत्पादन के कारण कमोडिटी केमिकल्स पर दबाव रह सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर्स: 2025-26 में आईफोन निर्यात ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच गए, जो भारत के US$29.4 अरब स्मार्टफोन निर्यात का लगभग तीन-चौथाई है। इसमें सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग फैसिलिटी, धोलेरा में टाटा वेफर फैब्रिकेशन प्रोजेक्ट और ₹40,000 करोड़ का इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स स्कीम शामिल है।
डिफेंस और कैपिटल गुड्स: 2025-26 में रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ रहा, जबकि निर्यात 63 प्रतिशत बढ़कर ₹38,424 करोड़ पहुंच गया और 80 से अधिक देशों में पहुंचा।
औद्योगिक निवेश और चुनौतियां
निजी निवेश घोषणाएं 2025-26 की पहली छमाही में लगभग दोगुनी होकर ₹14.6 लाख करोड़ हो गईं, जिससे लॉजिस्टिक्स, कैपिटल गुड्स, पावर इक्विपमेंट और इंजीनियरिंग सर्विसेज जैसी औद्योगिक सेवाओं की मांग बढ़ी। हालांकि, भूमि अधिग्रहण में देरी, आयातित इनपुट पर उच्च शुल्क, असमान आधारभूत संरचना और महत्वपूर्ण घटकों के लिए चीन पर निर्भरता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। भारत अपनी बल्क ड्रग सामग्री का लगभग 70 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बदलावों का लाभ उठाने के लिए चीन को पूरी तरह बदलने की आवश्यकता नहीं है। वैश्विक विनिर्माण में भारत की हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से 5 प्रतिशत होने पर यह विस्तार मैक्सिको के पूरे विनिर्माण क्षेत्र के बराबर होगा। रिपोर्ट ने सिद्ध विनिर्माण क्षमता, विशेष विनिर्माण और नई फैक्ट्रियों के लिए आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।
— कारोबार समाचार ब्यूरो
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