मुंबई, 26 अक्टूबर। केयर ईएसजी रेटिंग्स लिमिटेड (CARE ESG Ratings Limited) की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र 2030 तक 180 से 200 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित कर सकता है। हालांकि, उत्पादन लागत, अवसंरचना और सर्टिफिकेशन से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
रिपोर्ट ‘व्हाई ग्रीन हाइड्रोजन इज बिकमिंग एन इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी क्वेश्चन’ में कहा गया है कि ग्रीन हाइड्रोजन अब भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और डिकार्बोनाइजेशन के केंद्र में है। इसका असर स्टील, उर्वरक, रिफाइनिंग और केमिकल सेक्टर पर पड़ेगा। भारत अब जलवायु लक्ष्यों के साथ-साथ एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी कम कार्बन औद्योगिक उत्पादों का बड़ा उत्पादक बनने की दिशा में है।
कार्बन बॉर्डर टैक्स का असर
यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के चलते ग्रीन हाइड्रोजन की आवश्यकता और बढ़ गई है। यह मैकेनिज्म कार्बन-इंटेंसिव वस्तुओं के आयात पर कार्बन से जुड़े शुल्क लगाता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय स्टील निर्यातकों को यूरोप भेजी जाने वाली हर टन स्टील पर 70 से 190 डॉलर का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है, जो डिफॉल्ट एमिशन वैल्यू लागू होने पर 270 डॉलर प्रति टन से भी ऊपर जा सकता है।
केयरएज-ईएसजी के मुख्य रेटिंग्स अधिकारी निकुंज दुबे ने कहा, “भारत की ग्रीन हाइड्रोजन महत्वाकांक्षा तभी पूरी हो सकती है जब व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रोजेक्ट्स, भरोसेमंद ऑफटेक एग्रीमेंट, प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत और मजबूत अवसंरचना हो। प्रभावी क्रियान्वयन ही अपनाने की गति तय करेगा। इसमें इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, रिन्यूएबल एनर्जी, स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन और एंड-यूज तक पूरे वैल्यू चेन में अवसर हैं।”
लागत और अपनाने की चुनौतियां
फिलहाल ग्रीन हाइड्रोजन की लागत करीब ₹350–450 प्रति किलोग्राम है, जबकि पारंपरिक ग्रे हाइड्रोजन ₹160–200 प्रति किलोग्राम में उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक लागत घटकर लगभग 2.4 डॉलर प्रति किलोग्राम हो सकती है, बशर्ते रिन्यूएबल बिजली सस्ती हो, इलेक्ट्रोलाइजर की लागत घटे और प्रोजेक्ट बड़े पैमाने पर हों। तब तक नीति समर्थन, कार्बन प्राइसिंग और निश्चित औद्योगिक मांग जरूरी होगी।
उर्वरक और स्टील प्रमुख मांग कारक हैं। भारत हर साल लगभग 17–19 मिलियन मीट्रिक टन अमोनिया का उपभोग करता है, जो मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से बनता है। ग्रीन अमोनिया से फॉसिल फ्यूल आयात और उत्सर्जन घटाने में मदद मिलेगी। अगस्त 2025 में सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की नीलामी में ₹49.75 प्रति किलोग्राम की बेंचमार्क बोली लगी थी, लेकिन 13 ऑफटेकर्स में से दो के हटने से क्रियान्वयन की चुनौतियां सामने आईं।
भारत ने 2025 में लगभग 164.9 मिलियन मीट्रिक टन स्टील का उत्पादन किया, जिससे वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक बना। रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे कार्बन से जुड़े व्यापार नियम बदलेंगे, उत्सर्जन तीव्रता घटाना और जरूरी होगा।
लक्ष्यों के बावजूद धीमी प्रगति
जनवरी 2023 में शुरू हुई राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत 19,744 करोड़ रुपये के बजट के साथ 2030 तक कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य है। हालांकि, फरवरी 2026 तक देश में केवल लगभग 8,000 टन प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता ही स्थापित हो पाई है।
वैश्विक स्तर पर, घोषित लो-इमिशन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स 2030 तक 27 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन दे सकते हैं, लेकिन केवल 6 मिलियन टन वार्षिक प्रोजेक्ट्स ही संचालन, निर्माण या अंतिम निवेश निर्णय के चरण में हैं। रिपोर्ट में फाइनेंसिंग, अवसंरचना और दीर्घकालिक ऑफटेक समझौतों की जरूरत पर जोर दिया गया है।
कॉरपोरेट निवेश और सर्टिफिकेशन
भारतीय कंपनियों ने बड़े निवेश की घोषणा की है: रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम में ₹75,000 करोड़ निवेश का ऐलान किया है, अदाणी एंटरप्राइजेज अगले दशक में ग्रीन हाइड्रोजन पर 50 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश करेगी और एनटीपीसी ने आंध्र प्रदेश में ग्रीन हाइड्रोजन हब का प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि असली प्रगति वित्तीय क्लोजर, सुनिश्चित मांग और व्यवहार्य ऑपरेटिंग मॉडल पर निर्भर करेगी।
क्षेत्र के विस्तार के लिए स्टोरेज, पाइपलाइन, पोर्ट अवसंरचना और भरोसेमंद ऑफटेक में निवेश जरूरी है। 2025 में शुरू हुई भारत की ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ट्रेसबिलिटी का ढांचा देती है और निर्यात के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनने का प्रयास करती है। रिपोर्ट में भारत की इलेक्ट्रोलाइजर कंपोनेंट्स के आयात पर निर्भरता को भी रेखांकित किया गया है और घरेलू निर्माण व नीति निरंतरता की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन उन क्षेत्रों को डिकार्बोनाइज करने में मदद कर सकता है जहां प्रत्यक्ष विद्युतीकरण संभव नहीं है, लेकिन निवेश प्रतिबद्धता और वास्तविक उत्पादन क्षमता के बीच की खाई पाटना, लागत व अवसंरचना सुधारना भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के लिए अहम होगा।
— कारोबार समाचार ब्यूरो
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