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18 CHC के निजी संचालन पर डॉक्टरों-स्वास्थ्य संगठनों का मोर्चा, सरकार से फैसला तत्काल वापस लेने की मांग

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डॉ. राकेश मालवीय बोले—खाली पद भरें, स्वास्थ्य बजट बढ़ाएं और सरकारी ढांचा मजबूत करें; निजीकरण समाधान नहीं

भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं के माध्यम से संचालित करने की प्रस्तावित प्रक्रिया को तत्काल निरस्त करने, डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के रिक्त पद भरने, स्वास्थ्य बजट बढ़ाने और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप मजबूत करने की मांग डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और जनस्वास्थ्य संगठनों ने की है।

यह जानकारी रविवार को यहां आयोजित एक पत्रकार वार्ता में डॉ. राकेश मालवीय तथा “स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के विरुद्ध कार्रवाई हेतु संयुक्त संगठन, मध्य प्रदेश” से जुड़े प्रतिनिधियों ने दी। उन्होंने कहा कि सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को निजी संचालन में देने के बजाय उनमें डॉक्टरों, विशेषज्ञों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर करनी चाहिए।

संयुक्त मंच ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को भेजे ज्ञापन में सात प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें 18 CHC को निजी संस्थाओं को सौंपने की प्रस्तावित प्रक्रिया तत्काल निरस्त करना, स्वास्थ्य विभाग के सभी स्वीकृत रिक्त पदों पर नियमित नियुक्तियां करना, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में टीचिंग और सपोर्ट स्टाफ के खाली पद भरना तथा CHC, PHC और उप स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या IPHS मानकों के अनुरूप बढ़ाना शामिल है।

मुख्य मांगें और प्रमुख बिंदु

संगठनों ने सरकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य बजट में पर्याप्त वृद्धि करने और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग की है। साथ ही बड़े स्वास्थ्य नीति संबंधी निर्णयों से पहले विशेषज्ञों, चिकित्सक संगठनों, स्वास्थ्यकर्मियों, जन संगठनों और स्थानीय समुदायों से व्यापक परामर्श की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया है।

संयुक्त मंच ने निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय “सभी के लिए स्वास्थ्य” और Universal Health Care के लक्ष्य के अनुरूप मजबूत, जवाबदेह और सुलभ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने की मांग की है।

“असली समस्या सरकारी निवेश और मानव संसाधन की कमी”

पत्रकार वार्ता में डॉ. राकेश मालवीय ने कहा कि मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक चुनौती निजीकरण का अभाव नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश की कमी, सरकारी संस्थानों में बड़ी संख्या में रिक्त पद और अपर्याप्त स्वास्थ्य ढांचा है।

संयुक्त मंच ने ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 का हवाला देते हुए दावा किया कि प्रदेश में 4,134 उप स्वास्थ्य केंद्र, 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में चिकित्सकों, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों, लैब तकनीशियनों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के पद लंबे समय से रिक्त हैं।

“डॉक्टरों की कमी है तो निजी संस्थाएं डॉक्टर कहां से लाएंगी?”

डॉ. मालवीय और संयुक्त मंच के प्रतिनिधियों ने सरकार के प्रस्ताव की बुनियादी धारणा पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि समस्या विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है तो सरकार को सबसे पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में स्वीकृत रिक्त पदों को नियमित नियुक्तियों से भरना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को निजी ऑपरेटरों के हवाले करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का प्रमुख उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है और ऐसे में गरीबों, किसानों, मजदूरों, आदिवासी समुदायों, महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों की सस्ती एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और कठिन होने की आशंका है।

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे में बड़ी कमी का दावा

संयुक्त मंच की ओर से जारी प्रेस सामग्री में चिकित्सा शिक्षा विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 का हवाला देते हुए कहा गया कि राज्य में 55 जिला अस्पताल, 51 ट्रॉमा सेंटर, 158 सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 10,256 उप स्वास्थ्य केंद्र और पांच पॉलिक्लिनिक संचालित हैं।

संगठनों ने दावा किया कि इनमें 3,698 विशेषज्ञ चिकित्सकों के पदों में 2,689 पद तथा 6,513 चिकित्सा अधिकारियों के पदों में 728 पद रिक्त हैं। संयुक्त मंच ने इसे प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के सामने गंभीर चुनौती बताया।

मातृ-शिशु स्वास्थ्य पर भी जताई चिंता

ज्ञापन में Sample Registration System यानी SRS Bulletin का उल्लेख करते हुए कहा गया कि देश में शिशु मृत्यु दर घटकर 24 प्रति हजार जीवित जन्म तक पहुंच गई है, जबकि मध्य प्रदेश में यह अब भी 35 प्रति हजार जीवित जन्म बताई गई है।

संगठनों का कहना है कि समय पर उपचार की कमी, कमजोर रेफरल प्रणाली, विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपलब्धता और ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं के बीच सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को और मजबूत करने की जरूरत है।

पहले के निजीकरण प्रयासों का भी उल्लेख

पत्रकार वार्ता में बताया गया कि प्रदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के निजी संचालन के प्रयास पहले भी हुए हैं। ज्ञापन में वर्ष 2015 में अलीराजपुर जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के निजी संचालन के प्रयास, 2020-21 में जिला अस्पतालों के निजीकरण संबंधी प्रस्ताव तथा 2024-25 में जिला अस्पतालों को निजी क्षेत्र को सौंपने के प्रयासों का उल्लेख किया गया है।

संगठनों का कहना है कि इन प्रयासों का चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों और जन संगठनों ने विरोध किया था।

संविधान के अनुच्छेद 21 और 47 का हवाला

संयुक्त मंच ने स्वास्थ्य सेवा को केवल कारोबारी गतिविधि मानने का विरोध करते हुए संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 47 के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार की राज्य की जिम्मेदारी का उल्लेख किया।

डॉ. मालवीय ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होनी चाहिए।

ज्ञापन और प्रेस सामग्री के अनुसार इस अभियान से चिकित्सा शिक्षा महासंघ, मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, शासकीय स्वायत्तशासी चिकित्सा अधिकारी संघ, मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, ईएसआई चिकित्सा अधिकारी, मध्य प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन, संविदा चिकित्सक संघ, आशा/आशा सहयोगिनी श्रमिक संघ और जन स्वास्थ्य अभियान मध्य प्रदेश सहित अन्य संगठन जुड़े हैं।

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