तंबाकू और सिगरेट से दूरी के बावजूद युवाओं में सामने आ रहे मामले, HPV संक्रमण से लेकर नुकीले दांत और कमजोर प्रतिरक्षा तक कई कारकों पर विशेषज्ञों का ध्यान
नई दिल्ली। लंबे समय तक मुंह के कैंसर को मुख्य रूप से धूम्रपान, तंबाकू चबाने और अत्यधिक शराब सेवन से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है। लेकिन अब अस्पतालों में सामने आ रही तस्वीर इस पारंपरिक धारणा को चुनौती दे रही है। 40 वर्ष से कम उम्र के ऐसे युवा भी जीभ और मुंह के कैंसर की चपेट में आ रहे हैं, जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी, वेपिंग नहीं की और तंबाकू भी नहीं चबाया।
सकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट–मेडिकल ऑन्कोलॉजी डॉ. विजय कुमार श्रीनिवासालु के अनुसार, ऑन्कोलॉजी और ईएनटी विभागों में युवा नॉन-स्मोकर्स के बीच मुंह के कैंसर के मामले चिंता बढ़ा रहे हैं। इनमें फिटनेस को लेकर सजग लोग और युवा महिलाएं भी शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव मुंह के कैंसर के जोखिम को केवल तंबाकू और धूम्रपान तक सीमित करके देखने की धारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताता है।
युवा नॉन-स्मोकर्स में कैंसर की बदलती तस्वीर
दुनियाभर में ओरल कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक आज भी तंबाकू है। इसके बावजूद अस्पतालों में एक ऐसा नया मरीज वर्ग दिखाई दे रहा है, जिसमें युवा, स्वास्थ्य के प्रति सजग और धूम्रपान न करने वाले लोग शामिल हैं।
कुछ क्लिनिकल अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि युवा नॉन-स्मोकर्स में पाए जाने वाले कुछ ट्यूमर अधिक आक्रामक व्यवहार कर सकते हैं और उपचार के बाद बीमारी दोबारा उभरने का जोखिम भी चिंता का विषय हो सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब ऐसे मामलों की कोशिकीय और जैविक प्रकृति को अधिक गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं।
1. HPV संक्रमण बन सकता है महत्वपूर्ण जोखिम
युवा वयस्कों में कैंसर के कुछ मामलों के पीछे Human papillomavirus infection यानी ह्यूमन पैपिलोमावायरस की भूमिका पर व्यापक शोध हो रहा है। विशेष रूप से हाई-रिस्क HPV-16 स्ट्रेन को लेकर चिकित्सा जगत सतर्क है।
आमतौर पर HPV को सर्वाइकल कैंसर से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह वायरस अंतरंग संपर्क के माध्यम से मुंह और गले के क्षेत्र तक भी पहुंच सकता है। अधिकांश लोगों में प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण को समय के साथ समाप्त कर देता है, लेकिन कुछ मामलों में वायरस लंबे समय तक शरीर में बना रह सकता है।
लगातार बने रहने वाले हाई-रिस्क संक्रमण से कोशिकाओं की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है और वर्षों के दौरान असामान्य कोशिका वृद्धि का खतरा बढ़ सकता है।
2. नुकीले दांत और लगातार होने वाली चोट
टूटा या नुकीला दांत, खुरदुरी फिलिंग अथवा ठीक से फिट न होने वाला डेंटल उपकरण यदि लगातार जीभ या गाल के अंदरूनी हिस्से से रगड़ खाता रहे, तो वहां बार-बार चोट हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसे एक ऐसे सूक्ष्म घाव की तरह समझा जा सकता है जिसे पूरी तरह ठीक होने का समय नहीं मिलता। लंबे समय तक बनी रहने वाली चोट और सूजन ऊतकों में बदलाव से जुड़ी हो सकती है। इसलिए मुंह के किसी पुराने घाव या अल्सर को सामान्य चोट मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
3. प्रतिरक्षा तंत्र में सूक्ष्म कमजोरी
युवा नॉन-स्मोकर्स में मुंह के कैंसर और प्रतिरक्षा तंत्र के संबंध पर भी शोध किया जा रहा है। डॉक्टर कभी-कभी रक्त जांच में न्यूट्रोफिल-टू-लिम्फोसाइट रेशियो यानी NLR का आकलन करते हैं, जो शरीर में सूजन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़ा संकेतक हो सकता है।
कुछ शोधों में युवा नॉन-स्मोकर्स में अलग तरह के इम्यून पैटर्न देखे गए हैं। इससे यह संभावना सामने आती है कि कुछ लोगों में शरीर की ‘इम्यून सर्विलांस’ प्रणाली शुरुआती असामान्य कोशिकाओं को पहचानने और समाप्त करने में अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती है।
4. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर भोजन की कमी
आधुनिक शहरी जीवनशैली भी शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकती है। प्रोसेस्ड भोजन, लगातार तनाव और ताजे खाद्य पदार्थों की कमी से शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ सकता है।
यदि आहार में विटामिन A, C और E सहित एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में न हों, तो कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से होने वाली क्षति से बचाने वाली प्राकृतिक सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।
सबसे जरूरी है ‘14 दिन का नियम’
युवा नॉन-स्मोकर्स में बीमारी देर से पकड़ में आने का एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि वे स्वयं को मुंह के कैंसर से सुरक्षित मान लेते हैं। मुंह में छाला, लाल-सफेद निशान या दर्द होने पर अक्सर इसे सामान्य माउथ अल्सर, दांत लगने या गाल कटने का परिणाम समझ लिया जाता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि मुंह में कोई भी छाला, लाल पैच, सफेद निशान या घाव यदि दो सप्ताह यानी 14 दिन के भीतर पूरी तरह ठीक न हो, तो उसकी जांच करानी चाहिए।
उम्र कम हो या अधिक और तंबाकू की आदत हो या न हो—लगातार बने रहने वाले बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इन चेतावनी संकेतों को न करें नजरअंदाज
मुंह में लाल या सफेद पैच जो ठीक न हों, गर्दन या गाल में लंबे समय तक बनी रहने वाली गांठ, दांतों का अचानक ढीला होना, बिना स्पष्ट कारण खून आना, निगलने में परेशानी और लंबे समय तक आवाज बैठी रहना—ये सभी ऐसे संकेत हैं जिनकी विशेषज्ञ जांच जरूरी हो सकती है।
डॉक्टर स्थिति के अनुसार बायोप्सी, अल्ट्रासाउंड या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं।
बचाव के लिए क्या करें?
यदि कोई नुकीला या टूटा हुआ दांत लगातार जीभ अथवा गाल को चोट पहुंचा रहा है, तो उसे तुरंत डेंटिस्ट को दिखाना चाहिए। खुरदुरी फिलिंग या ठीक से फिट न होने वाले डेंटल उपकरण को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
HPV vaccine को लेकर भी डॉक्टर से चर्चा की जा सकती है। यह वायरस से जुड़े कई कैंसरों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उम्र और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर टीकाकरण का निर्णय चिकित्सकीय सलाह से किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही भोजन में रंग-बिरंगे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ शामिल करना उपयोगी हो सकता है। महीने में एक बार आईने और मोबाइल की फ्लैशलाइट की मदद से जीभ के नीचे, जीभ के किनारों, मसूड़ों, गालों के अंदर और मुंह की ऊपरी सतह की जांच भी की जा सकती है।
अब केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं
मुंह के कैंसर को केवल अधिक उम्र के धूम्रपान करने वालों की बीमारी मानना अब पर्याप्त नहीं है। युवा उम्र और स्वस्थ जीवनशैली जोखिम कम कर सकती है, लेकिन पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देती।
मुंह में किसी असामान्य बदलाव की समय पर पहचान और विशेषज्ञ जांच सबसे महत्वपूर्ण है। कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से उपचार की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं और कई मामलों में जीवन बचाया जा सकता है।
विशेषज्ञ इनपुट: डॉ. विजय कुमार श्रीनिवासालु, सीनियर कंसल्टेंट–मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल




