नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह फार्मास्युटिकल कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं को रोकने के उपायों पर सुझाव देने और सिफारिशें करने के लिए एक समिति गठित करे।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर दिया जिसमें दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग को नियंत्रित करने और विनियमित करने के लिए अदालत द्वारा दिशा-निर्देश बनाए जाने की मांग की गई थी, जब तक कि कोई प्रभावी कानून लागू नहीं हो जाता।
यह आदेश केंद्र सरकार की 8 सितंबर को हुई सुनवाई में दी गई दलील के बाद आया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि सरकार तीन सदस्यीय समिति बना रही है। यह समिति यह जांचेगी कि क्या फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को प्रलोभन देने से रोकने के लिए वैधानिक ढांचा जरूरी है और यदि हां, तो उसका स्वरूप क्या हो। सरकार ने समिति को रिपोर्ट सौंपने के लिए दो महीने का समय मांगा है, जिसे अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। पीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए संकेत दिया था कि समिति को मजबूत करने के लिए निर्देश जारी किए जाएंगे।
पांच साल पुरानी याचिका
यह याचिका 2021 में फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FMSRAI) और अन्य द्वारा दायर की गई थी। इसमें दलील दी गई है कि दवा कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य पेशेवरों को दवाओं के प्रचार-प्रसार के तरीके को नियंत्रित करने के लिए कोई लागू करने योग्य कानून नहीं है। मौजूदा व्यवस्था डॉक्टरों को तो नियंत्रित करती है, लेकिन कंपनियों को नहीं।
इंडियन मेडिकल काउंसिल की 2002 की आचार संहिता के तहत डॉक्टर को प्रलोभन स्वीकार करने पर उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है, लेकिन प्रलोभन देने वाली कंपनी पर कोई वैधानिक दंड नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह खामी गैर-जरूरी दवाओं के पर्चे और महंगे ब्रांड्स के प्रचार को बढ़ावा देती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मरीजों के स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होता है।
यूसीपीएमपी 2024 पर सवाल
यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP), 2024 के तहत कंपनियों को स्वास्थ्य पेशेवरों और उनके परिवारों को गिफ्ट, यात्रा और आतिथ्य देने से रोका गया है। पीठ ने बार-बार सवाल उठाया है कि क्या इस कोड में प्रभावी प्रवर्तन की व्यवस्था है। साथ ही यह भी कहा कि मरीजों के पास इस कोड के तहत कोई सीधा वैधानिक उपाय नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने देरी पर आपत्ति जताई। उन्होंने बताया कि केंद्र ने 2022 के हलफनामे में अदालत को बताया था कि नीति आयोग के सदस्य की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति इस मुद्दे की जांच कर रही है। लगभग चार साल बाद फिर एक नई समिति का प्रस्ताव आ रहा है।
केंद्र का कहना है कि बड़ी फार्मा कंपनियां अब ऐसी प्रथाओं से काफी हद तक दूर हो गई हैं और समस्या मुख्य रूप से छोटे खिलाड़ियों में है। जब तक समिति की सिफारिशों पर कोई फैसला नहीं होता, तब तक फार्मा मार्केटिंग पर UCPMP 2024 लागू रहेगा।
उद्योग पर असर
अगर समिति वैधानिक ढांचे की सिफारिश करती है तो यह स्वैच्छिक अनुपालन से लागू करने योग्य दायित्वों की ओर बदलाव होगा। इसका सबसे अधिक असर उन छोटी और मझोली कंपनियों पर पड़ेगा, जो फील्ड-फोर्स आधारित प्रचार पर निर्भर हैं।
— कारोबार समाचार ब्यूरो
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