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भारत के जेन जेड युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ीं

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नई दिल्ली, 9 अक्टूबर। भारत में लगभग 70 प्रतिशत छात्र मध्यम से उच्च स्तर की चिंता का सामना कर रहे हैं, जबकि 60 प्रतिशत में डिप्रेशन के लक्षण और 70 प्रतिशत से अधिक में तनाव के बढ़े हुए संकेत देखे जा रहे हैं। ये आंकड़े मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा साझा किए गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शैक्षणिक और पेशेवर प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ युवाओं में सोशल मीडिया के शुरुआती और अत्यधिक उपयोग के कारण ये समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं।

हालांकि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन सस्ती देखभाल तक पहुंच अब भी सीमित है। थेरेपी की ऊँची लागत और समाज में जजमेंट का डर कई युवाओं को औपचारिक मदद लेने से रोकता है, भले ही ‘एंग्जायटी’, ‘बर्नआउट’ और ‘बाउंड्रीज’ जैसे शब्द आम बातचीत में शामिल हो गए हैं।

सोशल मीडिया और कार्यस्थल का दबाव

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि प्रतिस्पर्धी दाखिले, शुरुआती स्तर की नौकरियाँ और स्मार्टफोन का व्यापक प्रभाव युवाओं पर दोहरा दबाव डाल रहे हैं। डॉ. पवित्रा शंकर, एसोसिएट कंसल्टेंट, साइकियाट्री, आकाश हेल्थकेयर सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल ने बताया कि आज के युवा पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक ‘अदृश्य बोझ’ झेल रहे हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की चुनी हुई जिंदगी देखने से उनकी नींद में खलल, बॉडी इमेज की समस्या और अकेलेपन की भावना बढ़ रही है।

कार्यक्षेत्र में जेन जेड पेशेवर पारंपरिक अपेक्षाओं—जैसे लंबे समय तक काम और उपलब्धि—को चुनौती दे रहे हैं, जिससे वरिष्ठ सहयोगियों के साथ टकराव भी हो सकता है। डॉ. मिनाक्षी मंचंदा, एसोसिएट डायरेक्टर एवं प्रमुख – साइकियाट्री, एशियन हॉस्पिटल ने कहा कि ‘बाउंड्रीज’ की मांग को अक्सर आलस्य समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह बर्नआउट के खतरे को लेकर जागरूकता दर्शाता है।

मदद की राह में बाधाएँ और पारिवारिक नजरिया

कई युवा बताते हैं कि परिवार भले ही सहायक हो, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते, जिससे वे अपनी परेशानी को मजाक या अधिक उत्पादकता के पीछे छुपा लेते हैं। एक सर्वे में 77 प्रतिशत प्रतिभागियों ने थेरेपी को महंगा बताया, जबकि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मुख्यतः बड़े शहरों तक सीमित हैं, जिससे छोटे शहरों में सेवाएँ नहीं पहुंच पातीं।

डॉ. संतोष चव्हाण, कंसल्टेंट – मेंटल हेल्थ, ज्यूपिटर हॉस्पिटल, पुणे ने बढ़ती जागरूकता और सीमित इन्फ्रास्ट्रक्चर के बीच की खाई को रेखांकित किया। “छोटे शहर का कोई युवा भले ही अपनी समस्या समझता हो, लेकिन आसपास कोई विशेषज्ञ न हो या सेशन के लिए पैसे न हों। जागरूकता बिना पहुंच के निराशा और बढ़ा सकती है,” उन्होंने कहा।

विशेषज्ञों की सिफारिशें

विशेषज्ञ बहुस्तरीय समाधान सुझाते हैं, जैसे परिवारों को सलाह देने से पहले सुनना चाहिए और कॉलेजों व नियोक्ताओं को काउंसलिंग को बुनियादी सुविधा मानना चाहिए। डॉ. पवित्रा शंकर ने परिवारों को ‘और बताओ’ कहने की सलाह दी, जबकि डॉ. मिनाक्षी मंचंदा ने गोपनीय, सस्ती और सुगम काउंसलिंग सेवाओं की मांग की। डॉ. संतोष चव्हाण ने सामुदायिक और डिजिटल सपोर्ट विकल्प बढ़ाने के साथ ही शिक्षकों, प्रबंधकों और साथियों को संकेत पहचानने की ट्रेनिंग देने की बात कही, जैसे अलगाव, नींद में बदलाव या प्रदर्शन में अचानक गिरावट।

विशेषज्ञों ने नींद को प्राथमिकता देने, देर रात सोशल मीडिया सीमित करने और मित्रता को खुला रखने जैसी छोटी आदतों को भी जरूरी बताया। “युवाओं को दबाव से बचाने की मांग नहीं है, वे सिर्फ सुने जाने और जब जरूरत हो, सस्ती मदद मिल पाने की उम्मीद करते हैं,” डॉ. पवित्रा शंकर ने कहा।

— कारोबार समाचार ब्यूरो


अस्वीकरण: यह समाचार संबंधित संस्था द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित है और इसे एआई टूल्स की सहायता से संपादित किया गया है। कारोबार समाचार विज्ञप्ति में किए गए दावों, आंकड़ों या बयानों की पुष्टि, समर्थन या जिम्मेदारी नहीं लेता।

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