नई दिल्ली। जीवन बीमा को आमतौर पर लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा और बचत के साधन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन देश में बड़ी संख्या में पॉलिसीधारक अब पॉलिसी की अवधि पूरी होने से पहले ही इससे बाहर निकल रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में जीवन बीमा कंपनियों ने सरेंडर और निकासी के रूप में करीब ₹2.80 लाख करोड़ का भुगतान किया। यह राशि इसी अवधि में दिए गए ₹2.70 लाख करोड़ के मैच्योरिटी भुगतान से अधिक रही।
संसद में सरकार की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार, जीवन बीमा कंपनियों के कुल लाभ भुगतान में सरेंडर और निकासी की हिस्सेदारी FY2021-22 के 32% से बढ़कर FY2025-26 में 39% हो गई। इसके उलट मैच्योरिटी भुगतान की हिस्सेदारी इसी अवधि में 48% से घटकर 37% रह गई।
पांच साल में ₹1.58 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.80 लाख करोड़
आंकड़ों के मुताबिक, FY2021-22 में जीवन बीमा कंपनियों का surrender और withdrawal payout करीब ₹1.58 लाख करोड़ था। FY2025-26 में यह बढ़कर ₹2.80 लाख करोड़ हो गया। यानी पांच साल में भुगतान राशि करीब 77% बढ़ी है।
RBI की Financial Stability Report 2026 भी इस बदलाव को रेखांकित करती है। उसके अनुसार FY26 में surrender और withdrawal payouts कुल life insurance payouts का करीब 38.3% रहे, जबकि maturity benefits की हिस्सेदारी 36.9% रही। यह लगातार दूसरा साल है जब early-exit payouts की हिस्सेदारी maturity payouts से अधिक रही।
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। 39% का मतलब यह नहीं है कि 39% पॉलिसीधारकों ने अपनी पॉलिसियां सरेंडर कर दीं। यह कुल भुगतान में surrender और withdrawal की हिस्सेदारी है। इसी तरह ₹2.80 लाख करोड़ को सीधे “इतने लोगों का नुकसान” भी नहीं कहा जा सकता।
लोग पॉलिसी बीच में क्यों छोड़ रहे हैं?
सरकार के अनुसार, इस बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं। इनमें गलत या अनुपयुक्त उत्पाद खरीदना, प्रीमियम वहन करने में कठिनाई, पॉलिसी से अपेक्षित लाभ न मिलना, मिस-सेलिंग, बीमा उत्पादों की पर्याप्त जानकारी न होना और पॉलिसीधारक की आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव शामिल हैं।
हालिया वित्तीय विश्लेषणों में भी यही तस्वीर सामने आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक कई लोग जीवन बीमा को लंबी अवधि की सुरक्षा के बजाय बचत या निवेश उत्पाद समझकर खरीद लेते हैं। जब कुछ वर्षों बाद उन्हें लगता है कि पैसा आसानी से उपलब्ध नहीं है या अपेक्षित रिटर्न नहीं मिल रहा, तो वे पॉलिसी बंद करने का फैसला कर सकते हैं।
इसके अलावा नौकरी जाना, मेडिकल खर्च, बच्चों की शिक्षा, कर्ज चुकाना, कारोबार में नकदी की जरूरत या परिवार की बदलती आर्थिक परिस्थितियां भी पॉलिसी बंद करने का कारण बन सकती हैं।
RBI ने भी जताई चिंता
RBI ने Financial Stability Report 2026 में कहा है कि लगातार ऊंचे surrender rates पॉलिसीधारकों की असंतुष्टि, product mis-selling या वैकल्पिक वित्तीय उत्पादों से बढ़ते प्रतिस्पर्धी दबाव का संकेत हो सकते हैं।
इसका असर सिर्फ ग्राहक तक सीमित नहीं है। जीवन बीमा कंपनियां लंबी अवधि को ध्यान में रखकर अपनी संपत्तियों और देनदारियों का प्रबंधन करती हैं। यदि बड़ी संख्या में पॉलिसियां समय से पहले बंद होती हैं, तो कंपनियों को अपनी long-term investment strategy में बदलाव करना पड़ सकता है। RBI ने इसे asset-liability management (ALM) के लिए चुनौती बताया है, क्योंकि समय से पहले निकासी से लंबी अवधि वाली परिसंपत्तियों को अपेक्षा से पहले liquidate करने की जरूरत पड़ सकती है।
LIC का आंकड़ा सबसे बड़ा
FY2025-26 में अकेले LIC ने करीब ₹1.57 लाख करोड़ surrender और withdrawal payouts के रूप में दिए। यह राशि पिछले वित्त वर्ष के करीब ₹1.31 लाख करोड़ से अधिक थी।
अन्य प्रमुख कंपनियों में SBI Life का surrender और withdrawal payout करीब ₹29,294 करोड़, ICICI Prudential Life का ₹27,340 करोड़ और HDFC Life का ₹15,741 करोड़ रहा।
हालांकि LIC के मामले में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इतनी बड़ी राशि का एक हिस्सा उसके विशाल policy base और business scale को भी दर्शाता है। इसलिए केवल absolute surrender payout के आधार पर किसी कंपनी के product quality या mis-selling का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
IRDAI के नए नियमों से क्या बदला?
पॉलिसीधारकों को early exit में कुछ सुरक्षा देने के लिए IRDAI ने 2024 में surrender-value से जुड़े नियमों में बदलाव किए। नियमित प्रीमियम वाली eligible non-linked policies में guaranteed surrender value के तहत दूसरे वर्ष में कम से कम 30%, तीसरे वर्ष में 35% और चौथे से सातवें वर्ष के बीच 50% तक का न्यूनतम प्रावधान है। पॉलिसी की अंतिम दो वर्षों में यह न्यूनतम स्तर 90% तक पहुंचता है, हालांकि वास्तविक surrender value उत्पाद की शर्तों और लागू benefits पर निर्भर करती है।
IRDAI के नियमों में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि pure risk term insurance को सामान्य surrender-value व्यवस्था से बाहर रखा गया है। इसलिए traditional savings/endowment, linked या अन्य eligible products के surrender data को सीधे pure term insurance से जोड़ना सही नहीं होगा।
पॉलिसी लेने से पहले क्या देखें?
विशेषज्ञों के अनुसार जीवन बीमा खरीदते समय केवल premium और maturity amount देखना पर्याप्त नहीं है। ग्राहक को यह समझना चाहिए कि पॉलिसी का उद्देश्य protection है, savings है या investment-linked benefit।
पॉलिसी लेने से पहले खास तौर पर इन बातों को समझना चाहिए—
- पॉलिसी की पूरी अवधि कितनी है?
- Premium कितने वर्षों तक देना होगा?
- बीच में बंद करने पर कितनी surrender value मिलेगी?
- policy lapse होने पर क्या होगा?
- क्या loan या paid-up option उपलब्ध है?
- वास्तविक guaranteed benefit कितना है और कौन-सा benefit केवल अनुमानित है?
- insurer का persistency record कैसा है?
IRDAI ने 2024 के framework के तहत guaranteed और special surrender values की disclosure, free-look period, eligible savings products में policy loan और policyholder protection से जुड़े कई प्रावधानों को मजबूत किया है।
सबसे बड़ी सीख: पॉलिसी खरीदने से ज्यादा जरूरी है उसे समझना
जीवन बीमा की बढ़ती surrender और withdrawal payouts यह संकेत देते हैं कि बड़ी संख्या में ग्राहक लंबी अवधि की insurance commitment को लेकर या तो अपनी जरूरत का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं या खरीद के समय उन्हें product की liquidity, return और exit conditions की पूरी जानकारी नहीं मिल रही है।
हालांकि हर surrender को mis-selling का परिणाम मानना भी सही नहीं होगा। कुछ मामलों में आर्थिक मजबूरी, बदलती जरूरतें और बेहतर liquidity वाले दूसरे वित्तीय विकल्प भी early exit की वजह हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने यह भी चेताया है कि surrender और maturity payouts की तुलना को अकेले देखकर पूरे insurance sector की तस्वीर नहीं समझी जा सकती, क्योंकि maturity payouts पुराने वर्षों में बेची गई पॉलिसियों से आते हैं, जबकि surrender payouts में हाल के वर्षों में बेची गई बड़ी policy base भी शामिल है।
फिर भी ₹1.58 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.80 लाख करोड़ का surrender/withdrawal payout और maturity benefits से उसका आगे निकल जाना एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह ग्राहकों, insurers और regulators—तीनों के लिए यह सवाल खड़ा करता है कि जीवन बीमा को केवल बेचने पर जोर दिया जा रहा है या यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि ग्राहक जिस उत्पाद को खरीद रहा है, वह उसकी वास्तविक वित्तीय जरूरत के अनुरूप हो।




