देशभर में हर दूसरा डॉक्टर तनाव और थकान से जूझ रहा है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना आज भी वर्जित माना जाता है — मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां डॉक्टरों की कमी पहले से एक चुनौती है, वहां यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है
— कारोबार समाचार ब्यूरो
हर साल 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है — डॉक्टरों के प्रति आभार जताने और उनके योगदान को याद करने का दिन। लेकिन इस बार सवाल कुछ अलग है। जिस तरह डॉक्टर मरीजों की सेहत का ख्याल रखते हैं, क्या कोई उनकी सेहत का भी उतना ही ख्याल रखता है? सफेद कोट पहनकर मुस्कुराते हुए मरीजों से बात करने वाला यह वर्ग अंदर से किस कदर थका हुआ है, यह सवाल अब स्वास्थ्य जगत में गंभीरता से उठने लगा है।
आंकड़े जो चौंकाते हैं
हाल ही में सामने आए स्वास्थ्य क्षेत्र के सर्वेक्षणों और शोध पत्रों में जो तस्वीर उभरकर आई है, वह वाकई चिंताजनक है। देश के करीब 83 प्रतिशत डॉक्टर किसी न किसी रूप में मानसिक या भावनात्मक थकान का सामना कर रहे हैं, और महिला डॉक्टरों में यह आंकड़ा 87 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह समस्या छोटे शहरों में बड़े महानगरों से भी ज्यादा गंभीर है — टियर-2 और टियर-3 शहरों में करीब 85 प्रतिशत डॉक्टर थकावट की शिकायत करते हैं, जबकि बड़े शहरों में यह आंकड़ा तुलनात्मक रूप से कम, यानी 74 प्रतिशत के आसपास है।
काम के घंटों की बात करें तो देशभर में सर्वे में शामिल डॉक्टरों में से आधे हर हफ्ते 60 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, और करीब 15 प्रतिशत डॉक्टर तो 80 घंटे प्रति सप्ताह की सीमा भी पार कर जाते हैं — यानी लगभग हर दिन 11-12 घंटे से ज्यादा काम। एक ऐसे पेशे में जहां एकाग्रता और सटीक फैसलों की जरूरत हर पल होती है, इतनी लंबी और थकाने वाली शिफ्ट का सीधा असर मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
चिकित्सा शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों की मानें तो भारत में हुए दर्जनों शोधों को खंगालने पर यह तथ्य सामने आया कि आधे से ज्यादा डॉक्टरों में अवसाद (डिप्रेशन) और चिंता (एंग्जायटी) के गंभीर लक्षण मौजूद हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह किसी एक डॉक्टर या अस्पताल की समस्या नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से जुड़ी एक संरचनात्मक चुनौती है।
मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के लिए यह सवाल और अहम क्यों?
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही डॉक्टरों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित विशेषज्ञ उपलब्धता और बढ़ते मरीज-भार जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में जो डॉक्टर उपलब्ध हैं, उन पर काम का दबाव राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा होने की आशंका रहती है। छोटे शहरों और कस्बों में तैनात डॉक्टरों के पास अक्सर न तो बड़े महानगरों जैसी सहायक स्टाफ की सुविधा होती है, न ही तनाव प्रबंधन या काउंसलिंग जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं। यही वजह है कि टियर-2 और टियर-3 शहरों में डॉक्टरों की थकान का आंकड़ा महानगरों से ज्यादा पाया गया है — और मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।
चुप्पी क्यों टूटती नहीं?
डॉक्टरों की जिंदगी में मौत, गंभीर बीमारी और पारिवारिक त्रासदियां रोजमर्रा की बात हैं। मरीजों और उनके परिजनों को संभालते-संभालते डॉक्टर खुद अपने भीतर के दर्द को दबाकर रख देते हैं, क्योंकि पेशे की बनावट ही ऐसी है कि “कमजोरी दिखाना” कतई स्वीकार्य नहीं समझा जाता। करियर पर असर, सहकर्मियों की राय, गोपनीयता को लेकर आशंका और सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) — ये सब मिलकर एक ऐसी दीवार खड़ी कर देते हैं, जिसे लांघना डॉक्टरों के लिए भी आसान नहीं होता।
विडंबना यह है कि जो पेशा दूसरों को मानसिक और शारीरिक बीमारी से उबरने में मदद करता है, वही पेशा अपने भीतर के लोगों को समय पर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करने में अब तक पिछड़ा हुआ है।
अब बदलाव की जरूरत किस स्तर पर?
स्वास्थ्य जगत के जानकार इस बात पर एकमत हैं कि डॉक्टरों की सेहत को अब व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संस्थागत जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए जो सुझाव सामने आ रहे हैं, वे इस प्रकार हैं:
- हर अस्पताल और स्वास्थ्य संस्थान में गोपनीय काउंसलिंग सेवा की व्यवस्था
- डॉक्टरों के लिए पीयर-सपोर्ट ग्रुप, जहां वे बिना किसी डर के अपनी बात साझा कर सकें
- ड्यूटी के घंटों में तर्कसंगत सीमा और पर्याप्त विश्राम की सुविधा
- नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर, खासकर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए
- कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न के प्रति सख्त जीरो-टॉलरेंस नीति
- मेडिकल शिक्षा के दौरान ही भावनात्मक प्रबंधन और संवाद कौशल का प्रशिक्षण, ताकि युवा डॉक्टर शुरुआत से ही इन चुनौतियों से निपटना सीख सकें
- कागजी कामकाज घटाने के लिए बेहतर डिजिटल और तकनीकी सहयोग, ताकि डॉक्टरों का समय मरीजों पर ज्यादा और प्रशासनिक बोझ पर कम खर्च हो
निष्कर्ष
नेशनल डॉक्टर्स डे केवल शुभकामनाएं देने या धन्यवाद कहने भर का दिन नहीं होना चाहिए। यह मौका है यह सोचने का कि जो लोग हर दिन दूसरों को स्वस्थ रखने में अपनी जिंदगी खपा देते हैं, उनकी अपनी सेहत का ख्याल कौन रखता है। जब तक अस्पताल प्रबंधन, सरकारें और समाज मिलकर डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक सेहत को उतनी ही गंभीरता से नहीं लेंगे, जितनी गंभीरता से मरीजों के इलाज को लिया जाता है, तब तक यह सवाल अनुत्तरित ही रहेगा — आखिर डॉक्टरों को कौन ठीक करता है?
— कारोबार समाचार ब्यूरो




