विश्व मस्तिष्क दिवस (22 जुलाई) विशेष | कारोबार समाचार हेल्थ डेस्क
क्या आपने कभी सोचा है कि अचानक किसी व्यक्ति का एक हाथ काम करना बंद कर दे, बोलने में परेशानी होने लगे या चेहरा एक तरफ झुक जाए? अधिकांश लोग इसे थकान, लो ब्लड प्रेशर या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यही लक्षण ब्रेन स्ट्रोक के हो सकते हैं और यदि समय पर इलाज न मिले तो कुछ ही घंटों में यह व्यक्ति को जीवनभर के लिए विकलांग बना सकता है।
चिंता की बात यह है कि अब स्ट्रोक केवल 60-70 वर्ष के बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है। डॉक्टरों के अनुसार भारत में 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में भी स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। बदलती जीवनशैली, तनाव, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान, नींद की कमी और लंबे समय तक बैठे रहने की आदत ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है।
विश्व मस्तिष्क दिवस (22 जुलाई) के अवसर पर विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि मस्तिष्क की सेहत को भी उतनी ही गंभीरता से लें, जितनी दिल की सेहत को दी जाती है। क्योंकि स्ट्रोक में हर मिनट की देरी मस्तिष्क की लाखों कोशिकाओं को नष्ट कर सकती है।
दुनिया में हर 10 में से 4 लोग किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से प्रभावित
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार आज दुनिया भर में 3.4 अरब से अधिक लोग किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से प्रभावित हैं। इसका अर्थ है कि विश्व की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी किसी समस्या का सामना कर रही है।
इन बीमारियों के कारण हर साल 1.1 करोड़ से अधिक लोगों की मौत होती है। यही कारण है कि न्यूरोलॉजिकल रोग अब दुनिया में विकलांगता का सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ आधुनिक जीवनशैली भी इस समस्या को तेजी से बढ़ा रही है।
भारत में हर साल लगभग 12.5 लाख नए स्ट्रोक के मामले
भारत में स्ट्रोक अब तेजी से बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है।
अनुमान है कि देश में हर वर्ष लगभग 12.5 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं। पिछले तीन दशकों में इनकी संख्या लगातार बढ़ी है।
इस वृद्धि के पीछे कई कारण हैं—
- अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर
- डायबिटीज
- बढ़ता मोटापा
- कोलेस्ट्रॉल की समस्या
- धूम्रपान और तंबाकू
- अत्यधिक शराब
- तनावपूर्ण जीवन
- देर रात तक जागना
- जंक फूड
- शारीरिक गतिविधि की कमी
डॉक्टरों का कहना है कि इनमें से अधिकांश कारण ऐसे हैं जिन्हें सही जीवनशैली अपनाकर काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
आखिर स्ट्रोक होता क्या है?
साधारण भाषा में समझें तो स्ट्रोक मस्तिष्क का हार्ट अटैक है।
जैसे हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली नस बंद हो जाए तो हार्ट अटैक होता है, उसी प्रकार जब मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त की आपूर्ति रुक जाती है या रक्त वाहिका फट जाती है तो उस हिस्से की कोशिकाएं ऑक्सीजन के अभाव में मरने लगती हैं। यही स्थिति ब्रेन स्ट्रोक कहलाती है।
स्ट्रोक मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
1. इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke)
यह सबसे सामान्य प्रकार है। लगभग 80 से 85 प्रतिशत मामलों में यही पाया जाता है। इसमें रक्त का थक्का (Blood Clot) मस्तिष्क की रक्त वाहिका को बंद कर देता है।
2. हेमरेजिक स्ट्रोक (Hemorrhagic Stroke)
इसमें मस्तिष्क की रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क में रक्तस्राव होने लगता है। यह अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन अधिक गंभीर हो सकता है।
दोनों ही स्थितियों में तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी होती है।
युवाओं में क्यों बढ़ रहा है स्ट्रोक?
पहले माना जाता था कि स्ट्रोक केवल बुजुर्गों की बीमारी है। लेकिन अब डॉक्टरों का अनुभव कुछ और कहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार आज का युवा कई ऐसे जोखिम कारकों के साथ जीवन जी रहा है जो पहले कम देखने को मिलते थे।
लगातार तनाव
कार्यालय का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव शरीर में कई हार्मोनल बदलाव लाते हैं, जो लंबे समय में रक्तचाप बढ़ा सकते हैं।
खराब खानपान
फास्ट फूड, अधिक नमक, ट्रांस फैट और मीठे पेय पदार्थ मोटापा, डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा बढ़ाते हैं।
घंटों बैठकर काम
कंप्यूटर और मोबाइल पर लंबे समय तक बैठे रहने से शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है, जिससे हृदय और रक्त वाहिकाओं पर नकारात्मक असर पड़ता है।
पर्याप्त नींद का अभाव
रोजाना 6 घंटे से कम नींद लेने वाले लोगों में उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का खतरा अधिक पाया गया है।
धूम्रपान और तंबाकू
तंबाकू रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और रक्त के थक्के बनने का खतरा बढ़ाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
CARE Hospitals, हैदराबाद के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. एस. के. जायसवाल के अनुसार अब कम उम्र के मरीजों में भी स्ट्रोक और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
उनका कहना है कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग शुरुआती लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। कई मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब उन्हें लकवा मार चुका होता है, बोलने में कठिनाई होने लगती है या वे बेहोशी की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रोक के इलाज में समय ही सबसे बड़ी दवा है। जितनी जल्दी मरीज सही अस्पताल पहुंचेगा, उसके पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना उतनी अधिक होगी।
(क्रमशः – अगले भाग में पढ़ें: स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण, FAST टेस्ट, गोल्डन 4.5 घंटे, क्या करें और क्या बिल्कुल न करें।)

